वायु तत्व

समस्त सजीव पदार्थ वायु से ही जीवन पाते हैं, जिससे प्राणी में पौरुष तत्त्व एवं चेतना जाग्रत होती है। पृथ्वी पर एक वायुमण्डल विद्यमान है, जिससे निसर्ग सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। वायुमण्डल में सबसे ज्यादा अंश नाइट्रोजन का है, जो सभी वनस्पतियों की वृद्धि के लिए आवश्यक है। वायुमण्डल में ऑक्सीजन की मात्रा 21 प्रतिशत है। यही ऑक्सीजन सजीव प्राणियों का मुख्य स्रोत है। अन्य ग्रहों पर ऑक्सीजन नहीं है, इसलिए वहां जीवन भी नहीं है। अधिकतर वनस्पतियां दिन के समय वातावारण में व्याप्त कार्बनडाइ-ऑक्साइड का शोषण करती हैं तथा ऑक्सीजन बाहर निकालती हैं, परन्तु रात्रि के समय उनमें सर्वथा इसके विपरीत क्रिया होती है। उस समय वह ऑक्सीजन का शोषण करती हैं और कार्बनडाइ- ऑक्साइड को बाहर निकालती हैं, जो मानव शरीर के लिए हानिकारक है, इसलिए रात्रि में पेड़ों के नीचे नहीं सोना चाहिए। वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तानुसार भवन के ईशान कोण में अत्यन्त मंगलकारी अल्ट्रा वायलेट किरणें आती रहती हैं, जो मानव जीवन के लिए कल्याणकारी होती हैं। यदि इस कोण में गन्दगी रहेगी तो कार्बनडाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन तथा अन्य आवश्यक गैसें उन लौकिक किरणों को दूषित कर देंगी, इसलिए भवन के समीप कोई श्मशान नहीं होना चाहिए, क्योंकि मृतक शरीर की दाह क्रिया से निकलने वाली निषिद्ध गैसें मानव जीवन पर बुरा प्रभाव डालती हैं। वातावरण में इन दूषित गैसों के अलावा आर्द्रता, वाष्प तथा धूलकण भी मिलते हैं। 'शब्द' और 'स्पर्श' इस तत्त्व के दो विशेष गुण हैं। स्पर्श से संवेदना, संवेदना से चेतना और चेतना से प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। उस प्रतिक्रिया से एक अर्थ मिलता है, जो शुभ और अशुभ फल प्रदान करता है, जिसके परिणाम स्वरूप संस्कार उत्पन्न होते हैं, जो जीवन को आचार-विचार की दिशा प्रदान करते हैं। इन्हीं आचार-विचारों के आधार पर व्यक्ति का मन और बुद्धि काम करती है। वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तानुसार मकान में वायु का प्रवेश द्वार एवं खिड़कियों से होता है, इसलिए हवा के लिए भवन की उत्तर दिशा खुली होनी चाहिए। प्रत्येक घर में रोशनदान तथा खिड़कियों द्वारा हवा के आवागमन की समुचित व्यवस्था होनी चाइये

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