पृथ्वी तत्व

पृथ्वी यानी भूमि । वास्तु भवन-निर्माण भूमि के बिना संभव नहीं है। लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व सूर्य के कक्ष से कुछ ग्रह अलग हो गए थे और उन्हीं से नवग्रहों तथा उपग्रहों का निर्माण हुआ। ये सभी ग्रह-उपग्रह आपसी आकर्षण के कारण सूर्य के चारों ओर अपनेअपने स्थानों पर विचरने लगे। कुछ समय बाद सूर्य से तीसरे स्थान पर स्थित पृथ्वी जैसे ही सूर्य से दूर हुई, वह शीतल यानी ठंडी होने लगी। उससे निकलने वाले ज्वालामुखी से पर्वत एवं घाटियों का निर्माण हुआ पृथ्वी के सभी सजीव व निर्जीव पदार्थों पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति अपना प्रभाव रखती है। अत: पृथ्वी का तत्व के रूप में विशेष महत्व है। पृथ्वी तथा अन्य तत्वों से ही जीवन का प्रारंभ हुआ है, इसलिए पृथ्वी को 'मां' की संज्ञा दी गई है। वही समस्त जीवों व निर्जीवों की जननी है। आवास/भवन आदि का निर्माण करते समय भूमि-पूजन का वास्तविक उद्देश्य भी यही है पर्यावरण तथा वायुमंडल से बाहर की अनेक शक्तियों का भी पृथ्वी से बहुत घनिष्ठ संबंध है। संपूर्ण सौर मंडल में पृथ्वी ग्रह पर ही जीवन है। संभव है कि ब्रह्मांड के अन्य सौर मंडलों में भी अन्य ग्रहों पर पृथ्वी के समान जीवन हो। पृथ्वी में स्पर्श, ध्वनि, रूप, रस के अतिरिक्त गंध का विशेष गुण विद्यमान है। उपर्युक्त पंच तत्वों को यथोचित मान एवं समुचित स्थान देते हुए प्रत्येक मनुष्य को आरोग्य, उन्नति, समृद्धि तथा मन की शांति हेतु पूर्ण चेष्टा करनी चाहिए। संपूर्ण जगत के वास्तुशास्त्रों का पंचमहाभूतों से घनिष्ठ संबंध है। अतः वास्तुशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार भवन-निर्माण की क्रिया से पहले निवास योग्य भूमि-चयन के साथ-साथ उसका परीक्षण भी कर लेना चाहिए। यदि आवासीय तथा व्यावसायिक भवन निर्माण करते समय इस पृथ्वी (भूमि) तत्व का यथोचित ध्यान रखा जाए तो ब्रह्मांड की अद्भुत शक्ति का उपहार मनुष्य जीवन को सुखी एवं संपन्न बनाने में सहायक सिद्ध होगा।

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